एनआरसीसी ने मनाया 39 वां स्थापना दिवस
बीकानेर 05.07.2022 । ऊँट पालन व्यवसाय को मजबूती प्रदान करने के लिए इस प्रजाति का आर्थिकी दृष्टिकोण से उपयोग लिया जाना चाहिए, इस दिशा में खासकर उष्ट्र दुग्ध व्यवसाय से ऊँट पालकों की आय को बढ़ाना होगा ताकि उनके समाजार्थिक स्तर में अपेक्षित सुधार लाया जा सके। ये विचार आज भाकृअनुप-राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र के 39 वें स्थापना दिवस के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में डॉ.एम.एस.साहनी, पूर्व निदेशक, एनआरसीसी ने व्यक्त किए।
डॉ.साहनी ने संस्थान को स्थापना दिवस की बधाई संप्रेषित करते हुए इस अवसर पर रखी गई ‘उष्ट्र उत्पाद प्रसंस्करण एवं विपणन में चुनौतियां’ विषयक वैज्ञानिक-उष्ट्र हितधारक परिचर्चा के दौरान कहा कि दूध की औषधीय व पोषकीय महत्व को देखते हुए विशेषकर उष्ट्र-हित धारक, इसकी लोकप्रियता में वृद्धि हेतु आगे आएं।
वहीं उन्होंने दूध की विभिन्न मानव रोगों यथा- मधुमेह, क्षय रोग आदि में महत्व को देखते हुए समन्वयात्मक अनुसंधान कार्यों को आगे बढ़ाने पर भी जोर दिया।
केन्द्र निदेशक एवं कार्यक्रम अध्यक्ष डॉ. आर्तबन्धु साहू ने विगत वर्षों की अनुसंधान उपलब्धियों एवं गतिविधियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बदलते परिवेश में संस्थान ऊँट की उपयोगिता को नए आयामों में स्थापित करने के लिए सतत प्रयत्नशील है। डॉ.साहू ने कहा कि ऊँटों की लगभग 37 प्रतिशत आबादी घटी है जबकि पड़ौसी राज्य गुजरात में इसका असर कम पड़ा, इस हेतु प्रदेश में ‘राजकीय पशु-ऊँट’ संबंधी नीतिगत बदलाव अपेक्षित है।
केन्द्र निदेशक ने साथ ही कहा कि प्रदेश के किसान को ऊँट की बहुआयामी उपयोगिता की सोच बनानी होगी क्योंकि इसके दूध, बाल, चमड़ी, खाद आदि सभी में उद्यमिता की प्रबल संभावनाएं विद्यमान हैं। उन्होंने कहा कि केन्द्र इन सभी पहलुओं पर गहनता के साथ काम करते हुए आगे बढ़ रहा है। आज पर्यटन के क्षेत्र में पर्यटकों की सालाना संख्या लगभग 50 हजार पहुंच गई है। अत: इसके हरेक पहलू के महत्व के आधार पर इसे ‘औषधि का भण्डार’ कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में पधारे डॉ.जी.पी.सिंह, पूर्व निदेशक, एनआरसीसी ने सदन के समक्ष ऊँट की घटती संख्या कम क्यों होने का प्रश्न रखते हुए कहा कि उष्ट्र प्रजाति की उपयोगिता को आमजन तक पहुंचाने के लिए हमें महत्ती प्रयास करने होंगे क्योंकि इसके दूध को लेकर समाज में मिथक फैले हुए है तथा यद्यपि संस्थान ने उन मिथकों पर काफी हद तक विराम लगाने में सफलता पाई हैं, परंतु वृहद स्तर पर इस प्रजाति के महत्व को समझने की आवश्यकता है।
विशिष्ट अतिथि डॉ.एन.वी.पाटिल, पूर्व निदेशक, एनआरसीसी ने स्थापना दिवस को ऐतिहासिक अवसर बताते हुए कहा कि संस्थान ने उष्ट्र जनन, पोषण, आनुवांशिकी, शरीर कार्यिकी आदि में उल्लेखनीय कार्य किए हैं। लेकिन अब समय आ गया है जब इसके दूध की औषधीय उपयोगिता को भी आमजन जानें तथा इस हेतु उष्ट्र हितधारकों को आगे आना होगा।
स्थापना दिवस के इस अवसर पर वैज्ञानिक-उष्ट्र हितधारक परिचर्चा के चर्चा सत्र में भाग लेते हुए राज्य के विभिन्न जिलों से पहुंचे उद्यमियों ने ऊँटनी के दूध व्यवसाय के बढ़ते कारोबार, व्यवसाय से जुड़े लघु उद्योगों, तथा लोकप्रियता के बारे में अपने विचार रखे। केन्द्र द्वारा आयोजित इस परिचर्चा में मैसर्स उरमूल, बज्जू,बीकानेर, मैसर्स सारिका राईका दूध भण्डार, जयपुर, मैसर्स आदर्श कैमल मिल्क, जयपुर, मैसर्स मंगलम आर्टस्, जयपुर, मैसर्स मोदी डेयरी, बीकानेर, मैसर्स डेजर्ट हैण्डीक्राफ्ट, बीकानेर एवं मैसर्स पर्ल लेक्टो,जोधपुर के प्रतिनिधियों ने सक्रिय सहभागिता निभाई।
इस अवसर पर ‘दुग्ध उत्पादन क्षमता कैसे बढ़ाएं ? ’ विषयक विस्तार पत्रिका का विमोचन किया गया साथ ही उष्ट्र-हितधारकों/उद्यमियों के इस प्रजाति के विकास एवं संरक्षण की दिशा में किए जा रहे प्रयासों के लिए प्रशस्तिपत्र देकर सम्मानित किया गया वहीं संस्थान की प्रगति में उत्कृष्ट योगदान के लिए केन्द्र के अधिकारियों एवं कर्मचारियों को प्रशस्ति पत्र भी वितरित किए गए।
अतिथियों द्वारा पौधरोपण भी किया गया। कार्यक्रम में भाकृअनुप-राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केन्द्र के अध्यक्ष डॉ.एस.सी.मेहता एवं भाकृअनुप-केन्द्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसन्धान केन्द्र की प्रभागाध्यक्ष डॉ.निर्मला सैनी आदि ने भी सक्रिय सहभागिता निभाई। डॉ. आर.के.सावल, अध्यक्ष, आयोजन समिति ने सभी के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।
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