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अश्व अनुसंधान केंद्र पर हिंदी कार्यशाला एवं अभिनंदन समारोह का आयोजन हिंदी राजभाषा से राष्ट्रभाषा: एक स्वप्न या सच्चाई।

बीकानेर।राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र, बीकानेर पर आज हिन्दी कार्यशाला एवं अभिनंदन समारोह का आयोजन किया गया । कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए केंद्र के प्रभागाध्यक्ष डॉ एस सी मेहता ने कहा कि आज हम एक समसामयिक लेकिन जटिल विषय पर चर्चा करने जा रहे हैं जो है "हिंदी राजभाषा से राष्ट्रभाषा: एक स्वप्न या सच्चाई" । उन्होंने कहा कि आज हमने कार्यशाला का प्रारूप बदलते हुए इस विषय पर अपनी राय देने के लिए बीकानेर के बीस प्रमुख साहित्यकारों को आमंत्रित किया है एवं अपनी स्वयं की राय देते हुए कहा कि आज देश में एक स्थिर सरकार है एवं बहुत कठिन निर्णय ले रही है चाहे वह धारा 370 हटाने की बात हो या और कोई, ऐसी स्थिति में यह संभव है कि हिंदी राजभाषा से राष्ट्रभाषा का सफर भी शीघ्र ही पूरा कर ले । आज के कार्यक्रम में केंद्र की पहली राजभाषा पत्रिका “अश्वराज” का विमोचन भी अतिथियों द्वारा किया गया । कार्यशाला का सञ्चालन सबसे वरिष्ठ साहित्यकार, संपादक एवं प्रतिष्ठित समाज सेवी श्री लूणकरण छाजेड़ ने किया एवं अपनी राय रखते हुए कहा कि आज भी देश के कुछ राज्यों में हिंदी की जानकारी होते हुए भी उसके प्रति विरोध की स्थिति पैदा की जाती है, विभिन्न प्रांतों में रहने वाले सभी लोग अगर संकीर्ण विचारधारा से उबर कर सोचेंगे तो हिंदी राष्ट्रभाषा बन सकती है । उन्होंने यह भी कहा कि आज आर्टिफिशियल इंटेलेजन्स का समय है एवं विश्व बहुत आगे निकल गया है । परिचर्चा में भाग लेते हुए समारोह के मुख्य अतिथि राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ अनिल कुमार पुनिया ने कहा की अब जो समय आया गया उसमें तकनीक का प्रयोग भाषाओं को एक करता जा रहा है। अब आप बिना दुभाषिए के एक ही समय में एक भाषण को विभिन्न भाषाओं में सुन सकते हैं । उन्होंने अपने बचपन में हिन्दी लेखन, विचार एवं चर्चाओं का रोचक अनुभव भी सभी के साथ साझा किया । उन्होंने किसानों के लिए हिन्दी में लेखन पर जोर देने की बात भी कही । साहित्यकार श्री बुलाकी शर्मा ने कहा कि यह एक राजनैतिक विषय है वहीं संपादक एवं लेखक श्री हरीश बी शर्मा ने कहा कि यह एक संपर्क भाषा के रूप में सरकारी कार्य के लिए अपने गई लेकिन सिनेमा एवं साहित्य ने इसे आगे बढ़ाया है, उन्होंने राज भाषा एवं मातृ भाषा की व्याख्ख्या भी की। इस अवसर पर विशिष्ठ अतिथि राजकीय महाविद्यालय, गंगाशहर की प्राचार्य सुश्री बबिता जैन ने नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति की चर्चा की एवं बढ़ते हुए एआई के प्रयोग से मानसिक विकास पर विपरीत असर होने की बात कही । साथ ही हिंदी को धीरे धीरे राष्ट्रभाषा की ओर अग्रसर करने की नीति की बात कही। कार्यशाला में समाचार ब्यूरो चीफ डॉ नासिर जैदी ने कहा कि दिल की बात तो जुबां पर आएगी ही, चाहे जुबां हिंदी हो या उर्दू। उन्होंने दोनों भाषाओं को एक दूसरे की बहन बताया। वरिष्ठ अधिवक्ता श्री महेंद्र जैन ने कहा कि न्यायालयों में उर्दू के कई शब्द प्रयोग में आते हैं, हम बहस हिन्दी में करते हैं एवं रूलिंग अंग्रेजी में आती है जिससे बहुत कठिनाई होती है, अश्वराज पत्रिका में मैं ने इस विषय को सरल बनाने पर आलेख दिया है । काजरी के हिंदी अधिकारी एवं प्रधान वैज्ञानिक डॉ एन एस नाथावत ने कहा कि देखते देखते कई प्रमुख टीवी चैनल हिंदी में आ गये एवं इस बात पर जोर दिया कि बाजार इन सभी चीजों पर बहुत असर डालता है । विशिष्ठ अतिथि कथाकार श्री राजेन्द्र जोशी ने कहा कि कुछ बदलाव छोटे क्षेत्रों के लिए होता है लेकिन यह विषय पूरे राष्ट्र का विषय है इसलिए सभी देशवासियों के समर्थन से ही यह संभव हो पाएगा । उन्होंने कहा की हिन्दी विश्व में तीसरी सबसे अधिक बोले जाने वाली भाषा है लेकिन यह अपने ही राष्ट्र की पहली भाषा नहीं है । उष्ट्र अनुसंधान केंद्र के श्री नेमी चंद ने कहा की बाजार की अर्थ व्यवस्था काफी असर डालती है एवं वह हिन्दी को इस दिशा में बहुत आगे बढ़ा रही है । डॉ देवा राम ने कहा कि अब मेडिकल की पढ़ाई भी हिन्दी में होने जा रही है एवं हिन्दी आगे बढ़ रही है । श्री गौरी शंकर प्रजापत ने कहा कि क्षेत्रीय भाषाओं को साथ लेकर हिन्दी का विकास करना चाहिए । डॉ प्रशांत बिस्सा ने कहा की नई शिक्षा नीति से हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा । डॉ रेमेश देदर ने कहा की प्राचीन समय में डिंगल भाषा बहुत प्रचलित थी लेकिन समय के साथ पीछे रह गई । डॉ रत्ना प्रभा ने कहा की हिन्दी हमारी भाषा है लेकिन अनुसंधान कार्यों में हमें वैश्विक स्तर पर कार्य करना होता है जो कि अंग्रेजी के बिना संभव नहीं है । कार्यशाला को सारांशित करते हुए डॉ एस सी मेहता ने कहा की दिल की बात को कहने के लिए शब्दों की जरूरत तो होगी ही चाहे जमाना एआई का हो, एवं कहा कि पूर्व राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम साहब ने कहा था कि सपने वो हैं जो हम दिन की रोशनी में खुली आँखों से देखते हैं । हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखना एक सपना ही सही परंतु हमने इसे देखा है, देखते हैं कब पूरा होता है । 
 
आज के कार्यक्रम में सभी साहित्यकारों का उनके “अश्वराज” पत्रिका के प्रकाशन में सहयोग एवं हिन्दी को आगे बढ़ाने के लिए दिए गए योगदान के लिए सम्मानित किया गया । कार्यक्रम का संचालन राजभाषा अधिकारी एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ रत्ना प्रभा ने किया एवं कार्यक्रम मे डॉ लेघा, डॉ रमेश,डॉ राव , डॉ कुट्टी , डॉ जितेन्द्र सिंह एवं केंद्र के अन्य अधिकारीयों एवं कर्मचारियों ने भाग लिया ।
डॉ एस सी मेहता
प्रभागाध्यक्ष

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