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बीकानेर तकनीकी विश्वविद्यालय में “राष्ट्रिय पर्यावरण उत्सव” का आगाज आमजन में पर्यावरण के प्रति जागरूकता उत्पन्न एवं संरक्षण करने हेतु यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नलॉजी में विश्व पर्यावरण दिवस के उपलक्ष्य में 5 जून से 8 जून तक चलने वाले चार दिवसीय “राष्ट्रिय पर्यावरण उत्सव” का हुआ आज शुभारम्भ संपूर्ण देश भर से प्रतिभागी लेंगे हिस्सा : राष्ट्रीय वेबिनार, प्रश्नोत्तरी, निबंध, लेख, पोस्टर, संवाद सहित आयोजित होगी विभिन्न प्रतियोगिताएं साथ ही देश के विख्यात पर्यावरणविद देंगे व्याख्यान और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मुद्दों पर होगी चर्चा और मंथन मानव का प्रकृति में हस्तक्षेप पर्यावरण असंतुलन का मुख्य कारण : प्रो. अम्बरीष शरण विद्यार्थी, कुलपति

 

बीकानेर, 05 जून विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर बीकानेर तकनीकी विश्वविद्यालय द्वारा चार दिवसीय   “राष्ट्रिय पर्यावरण उत्सव” का आयोजन किया जा रहा है विश्वविद्यालय के सहायक जनसंपर्क अधिकारी विक्रम राठौड़   ने बताया की जिसके अंतर्गत यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी महाविद्यालय में विद्यार्थियों के लिए राष्ट्रीय वेबिनार, प्रश्नोत्तरी, निबंध, लेख, पोस्टर, संवाद सहित राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न ऑनलाइन प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाएगा। 
इस चार दिवसीय आयोजन का विषय इकोसिस्टम रीस्टोरेशन रखा गया है। आज के उद्घाटन सत्र में आयोजित हुए राष्ट्रीय वेबिनार को संबोधित करते हुए  मुख्य वक्ता राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान के पूर्व निदेशक डॉ. तपन चक्रवर्ती नें युवाओं का इकोसिस्टम रीस्टोरेशन में महत्वपूर्ण योगदान बताया। उन्होंने बताया कि प्रकृति ने समस्त जीवों की उत्पत्ति एक ही सिद्धांत के तहत की है वह समस्त चराचर जीवो के अस्तित्व को एक दूसरे से जुड़ा हुआ है लेकिन समस्या तब शुरू हुई जब मनुष्य ने स्वयं को पर्यावरण का हिस्सा ना मानकर उसको अपनी आवश्यकताओं के अनुसार विकृति करने लगा इन गतिविधियों ने प्रकृति के रूप को पूरी तरह बिगाड़ दिया हालात यह हो गए कि जो नदियां पहाड़ जंगल और जीव पृथ्वी पर हर और नजर आते थे इनकी संख्या घटती गई इतनी कि कोई विलुप्त हो गए और ढेरों विलुप्त के कगार पर है |
ऐसा लगता है कि इंसान समाज ने प्रकृति के विरुद्ध एक अघोषित युद्ध छेड़ रखा है और स्वयं को प्रकृति से अधिक ताकतवर साबित करने में जुटा हुआ हैकोरोना महामारी के कारण बीते डेढ़ वर्षो में दुनिया पूरी तरह बदल गई है इन बदली हुई परिस्थितियों में मनुष्य को प्रकृति और उसके पर्यावरण के प्रति नए सिरे से सोचने पर विवश किया है अब तक मनुष्य प्रकृति को तरह तरह से अपने वश में करने का उपाय कर रहा था लेकिन एक छोटे से वायरस के आगे पूरा मानव समुदाय असहाय नजर आ रहा है।
वेबिनार के अध्यक्षता करते हुए बीकानेर तकनीकी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अम्बरीष शरण विद्यार्थी नें कहा की पर्यावरणीय समस्याएं पृथ्वी और प्राकृतिक संसाधनों का आधुनिकता एवं वैज्ञानिकता के नाम पर अत्यधिक शोषण का परिणाम है। उपभोक्तावादी संस्कृति की अभिप्सा ने विज्ञान के विकास को विनाश में बदल दिया है जिसके फलस्वरूप पारिस्थितिकी असंतुलन, विभिन्न हानिकारक गैसों जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, क्लोरो फ्लोरो कार्बन में बढ़ोत्तरी, जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, वैश्विक तापन जैसी समस्याएं उत्पन्न हुई हैं।
 अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के प्रयोग से खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता गिरी है जिससे व्यक्तियों के स्वास्थ्य भी प्रभावित हुये हैं। निर्वनीकरण, नगरीकरण तथा औद्योगीकरण के कारण समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है। ऑक्सीजन उत्सर्जित एवं अवशोषित करने वाले वृक्षों की अनियंत्रित कटाई के कारण अनियमित वर्षा, भूमि अपरदन, प्रकृति प्रदत्त ऑक्सीजन में कमी हुई है। साथ ही चिकित्सिकीय अपशिष्टों का समुचित प्रबंधन का अभाव, प्लास्टिक का अत्यधिक उपयोग पर्यावरण प्रदूषण का कारण बन रहा है। इस प्रकार तकनीकी उन्नति और आर्थिक विकास के लिए समस्त भू-मण्डल एवं उस पर आश्रय पाने वाले जीव जंतुओं का अस्तित्व दांव पर लगा है। प्रकृति में ईश्वर का वास, वृक्षों को जीवन का आधार माना गया है। तरु देवो भव की संकल्पना इसका स्पष्ट उदाहरण है। नदियों, पाषाणों को भी देवत्व प्रदान किया गया जो आज भी उतना ही समीचीन है। अतः इनको आज भी पूजनीय बनाने की आवश्यकता है।
जल को दूषित न किया जाय, वृक्ष वनस्पतियों को न काटें तथा अधिक से अधिक वृक्ष लगायें। जल संरक्षण एवं प्रबंधन, अपशिष्ट प्रबंधन, वैकल्पिक ऊर्जा का प्रयोग, जैविक उर्वरकों का प्रयोग, संसाधनों के अनुपात में जनसंख्या वितरण, उपभोक्तावादी संस्कृति का परित्याग, वसुधैव कुटुम्बकम की भावना का विकास आवश्यक है। पर्यावरण के संरक्षण एवं पोषण में शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका है। शिक्षा संस्थानों, सरकारी तथा गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा पर्यावरण के प्रति संचेतना जागृत करने हेतु जागरूकता कार्यक्रम चलाए जायें। शिक्षा को समाज में परिवर्तन का मुख्य उपकरण एवं शिक्षक को परिवर्तन का संवाहक माना गया है। उससे शैक्षणिक कार्यों के साथ-साथ समुदाय से संबंधित अनेक कार्यों को कुशलता से करने की अपेक्षा की जाती है। 
अतः पर्यावरण के संरक्षण एवं उचित प्रबंधन हेतु उपयुक्त ज्ञान एवं कौशलों की समुचित नवीनतम जानकारी एवं प्रक्षिक्षण होना अति आवश्यक है ताकि वह भावी पीढ़ी के नागरिक छात्र समुदाय में पर्यावरण संबंधित आवश्यक ज्ञान, कौशल एवं अभिवृत्तियों का निपुणता से विकास कर सके। पर्यावरण संरक्षण के प्रशिक्षण का कार्य प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा के स्तर के समस्त शिक्षकों हेतु अनिवार्य रूप से समुचित सरकार एवं उसके द्वारा अभिहित शिक्षा प्रशासन से जुड़ी संस्थाओं द्वारा सुनिश्चित किया जाय। 
पर्यावरणीय समस्या किसी एक व्यक्ति, संस्था या किसी एक देश की न होकर समस्त विश्व में व्याप्त है। इसके संरक्षण में समस्त विश्व समुदाय के लोगों से सहयोग अपेक्षित नहीं बल्कि परम आवश्यक है ताकि मानवीय गतिविधियों और प्राकृतिक परिस्थितियों के बीच समन्वय स्थापित कर पर्यावरण को संपोषित एवं संरक्षित किया जा सके। प्रकृति में हस्तक्षेप का ही परिणाम हैं की पर्यावरण संतुलन बिगड़ता जा रहा है। अंत में उन्होंने उन्होंने विश्व पर्यावरण दिवस की बधाई प्रदान की।

कार्यक्रम के संरक्षक डॉ यदुनाथ सिंह, निदेशक अकादमिक बीकानेर तकनीकी विश्वविद्यालय नें विश्वविद्यालय में पर्यावरण संरक्षण से संबंधित चल रही समस्त गतिविधियों की जानकारी दी, उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय पूर्ण रूप से समाज को पर्यावरण संरक्षण हेतु जागरूक करने के लिए प्रयासरत है। युवा वर्ग अपनी जिम्मेदारी समझते हुए अपने भविष्य को संरक्षित करने हेतु प्रकृति का संरक्षण करे । प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण और पर्यावरण में बदलाव तेजी से हो रहे है। ऊर्जा की बड़े पैमाने पर खपत की वजह से पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है। वैकल्पिक मॉडल को अपनाकर पर्यावरण संकट से निपटने के उपाय खोजने होंगे। मानव समुदाय की सहभागिता से इस समस्या से निजात पाया जा सकता है।
पर्यावरण के लगातार हो रहे क्षरण, प्रदूषण एवं इकोलॉजिकल असंतुलन की भयावहता से आज सभी त्रस्त है। हम प्रयास करेंगे की प्रदेश के सभी सम्बद्ध महाविद्यालय और विद्यर्थियो को पर्यावरण संरक्षण की मुहीम से जोड़ा जा सके ताकि सभी पर्यावरण संरक्षण को लेकर अपने सामजिक जिम्मेदारियों का एहसास कर सके। विद्यार्थी अपने स्तर पर  पर्यावरण संरक्षण और संवर्धन  के लिए पर्यावरण चेतना की गतिविधियों का आयोजन करे। उन्होंने सभी अपील करते हुए कहा कि आप सभी पर्यावरण का संरक्षण करें और अधिक से अधिक वृक्षारोपण करें। आज कोरोना संक्रमण के समय पर्यावरण संरक्षण की अधिक जरूरत है, जिसे हम वृक्षारोपण के माध्यम से पूरी कर सकते हैं। बढ़ते प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों और पारिस्थिति की तंत्र पर बढ़ रहे दबाव को कम करने के लिए पेड़ लगाना ही सबसे आसान उपाय है।
कार्यक्रम की संयोजिका डॉ. ममता शर्मा नें बताया की इस चार दिवसीय राष्ट्रीय आयोजन में क्विज प्रियोगिता, लेखन प्रतियोगिता, पोस्टर मेकिंग प्रतियोगिता एवं जागरूकता वेबीनार मैं राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न महाविद्यालयों के विद्यार्थियों ने रजिस्ट्रेशन करवाया है। पर्यावरणीय समस्याओं एवं समाधान के परिपेक्ष्य में संगोष्ठी के विचारकों ने अनेक महत्वपूर्ण सुझाव प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन सह संयोजक डॉ. गुरु वीर सिंह ने किया व अंत में कार्यक्रम की सह संयोजिका डॉ अनु शर्मा ने सभी का धन्यवाद ज्ञापित किया। इस दौरान कार्यकारिणी समिति के सदस्य डॉ प्रीति पारीक, डॉ गायत्री शर्मा ,राजेश सुथार, करनजीत कौर, अमित कुमार सुधांशु, डॉ भूमिका चोपड़ा, ऋषभ बांठिया अदि उपस्थित रहे।


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