गुजरात में उभरते उष्ट्र दुग्ध व्यवसाय से सीख लें प्रदेश के ऊँट पालक : डॉ.साहू
विभिन्न दुग्ध उत्पादों की जानकारी लेकर इन्हें बनाना भी सीखें वहीं वे, उष्ट्र चमड़े, ऊन-बाल, हड्डी आदि से निर्मित उत्पादों को भी देखते हुए इस प्रजाति की बहुआयामी उपयोगिता को भी जानें। केन्द्र निदेशक ने एनआरसीसी द्वारा कैमल इको-टूरिज्म के दृष्टिकोण से विकसित विभिन्न पर्यटनीय सुविधाओं एवं आमजन में इसके प्रति बढ़ते रूझान के प्रति उनका ध्यान आकर्षित करवाते हुए उष्ट्र पर्यटन व्यवसाय की संभावनाओं को उजागर किया व इस ओर उन्हें प्रेरित किया। उन्होंने एनआरसीसी द्वारा ऊँट पालकों को और अधिक बेहतर रूप से प्रशिक्षित करने हेतु सहजीवन संस्था के माध्यम से दीर्घ अवधि के प्रशिक्षणों की आवश्यकता भी जताई।एनआरसीसी के एग्री बिजनेस इनक्यूबेशन सेंटर एवं इस प्रशिक्षण के समन्वयक डॉ. शिरीष नारनवरे, वरिष्ठ वैज्ञानिक ने जानकारी दीं कि प्रशिक्षण में गुजरात के इस दल को ऊँटनी के दूध उत्पादन क्षमता का विकास, थनैला रोग की पहचान व रोकथाम, ग्याभिन व दुधारू ऊँटनी की देखभाल, स्वच्छ दूध उत्पादन, पशुओं हेतु चारा उत्पादन प्रबंधन, पशु प्रजनन, ऊँटनी के दूध से उत्पाद तैयार करना, उष्ट्र पर्यटन द्वारा उद्यमिता विकास व पशु के विभिन्न संक्रामक रोगों पर विषय-विशेषज्ञ व्याख्यानों के माध्यम से जानकारी देंगे।
चर्चा सत्र के दौरान गुजरात की सहजीवन संस्था के प्रोजेक्ट कॉर्डिनेटर श्री महेश पी.गरवा व दल के अन्य सदस्यों ने जानदारी दीं कि वे, वे सरहद डेयरी सोसायटी के माध्यम से दूध को संग्रहण प्लांट तक पहुंचाते हैं, जिससे उन्हें इसके अच्छे भाव मिल रहे है। उन्होंने जानकारी दी कि अमूल द्वारा ऊँटनी के दूध के अलावा इससे बनी चॉकलेट व अन्य उत्पाद भी आमजन को सुलभ करवाए जा रहे हैं। गौरतलब है कि एनआरसीसी में आए इस दल के 10 प्रशिक्षणार्थियों द्वारा लगभग एक हजार ऊँट/ऊँटनियां रखी जा रही है जिनका मुख्य उपयोग दूध ही है।
प्रशिक्षण के प्रथम दिवस पर व्याख्यानों के अलावा इस दल को केन्द्र के वैज्ञानिक डॉ.शान्तनु रक्षित व डॉ.श्याम सुन्दर चौधरी द्वारा उष्ट्र डेरी एवं फीड उत्पादन इकाई का भ्रमण करवाते हुए व्यावहारिक जानकारी प्रदान की गई।








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