पृथ्वी दिवस पर एनआरसीसी में उष्ट्र संबंद्ध पर्यटनीय विकास हेतु गहन चर्चा
बीकानेर 22 अप्रैल 2022 । भाकृअनुप-राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र में आज विश्व पृथ्वी दिवस के उपलक्ष्य पर ऊँट के साथ उष्ट्र संबद्ध पर्यावरणीय पर्यटन विकास, गोचर (ओरण) एवं उष्ट्र संरक्षण के परिप्रेक्ष्य में एक गहन परिचर्चा आयोजित की गई।
केन्द्र निदेशक डॉ.आर्तबन्धु साहू की अध्यक्षता में आयोजित इस परिचर्चा में पर्यटन मंत्रालय, नई दिल्ली के सलाहकारों, आस-पास क्षेत्र के प्रगतिशील ऊँट पालकों, युवा उद्यमियों, एवं एनआरसीसी वैज्ञानिकों ने उष्ट्र पर्यटनीय विकास एवं संरक्षण संबंधी विभिन्न मुद्दों पर खुलकर चर्चा कीं।
इस बैठक में डॉ. नवीना जफा, पर्यटन सलाहकर, पर्यटन मंत्रालय, नई दिल्ली ने कहा कि उष्ट्र पर्यटन को बढ़ावा दिए जाने हेतु जमीनी स्तर पर प्रयास करने होंगे तथा हमें केवल विदेशी पर्यटक आगंतुकों पर निर्भर होने की बजाय भारतीय पर्यटकों को आकर्षित करने हेतु इस क्षेत्र में पारंपरिकता आधारित हर पहलू को आगे लाना होगा।
उन्होंने कहा कि ऊँटनी के दूध की औषधीय एवं खासकर वनस्पतिय उपयोगिता (तासीर) का स्वास्थ्य लाभ लेने हेतु जब आमजन इससे जुड़ेगा तो यह पहलू, इको-टूरिज्म के विकास में अत्यधिक सहायक होगा तथा हम इसके माध्यम से गोचर (ओरण) क्षेत्र को बचाने में भी सफल हो सकेंगे।
डॉ. जफा ने उष्ट्र सवारी के अलावा गोचर के संरक्षण पर बल देते हुए कहा कि आने वाले समय में अधिकाधिक लोग शांति प्राप्त करने के लिए प्रकृति के साथ विशुद्ध भाव से जुड़ना पसंद करेंगे तथा यदि ओरण क्षेत्रों को स्वास्थ्य, मेडिटेशन आदि के दृष्टिकोण से देखा जाए तो ये सर्वथा उपयुक्त होंगे,
इसलिए ग्रामीण अंचल की पारंपरिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों को ओरण तक लाने के लिए हमें हर सांस्कृतिक पहलू संबंधी प्रयास करने होंगे तभी ऊँट प्रजाति को भी संरक्षित किया जा सकेगा।
इस महत्वपूर्ण बैठक में केन्द्र के निदेशक डॉ.आर्तबन्धु साहू ने कहा कि वैश्विक नजर डालें तो ऊँट की तादाद बढ़ रही है, परंतु भारत में यह घट रही है। डॉ. साहू ने एनआरसीसी द्वारा उष्ट्र इको-टूरिज्म को बढ़ावा देने हेतु किए जा रहे प्रयासों की जानकारी देते हुए कहा कि हमें पर्यटन को केवल पर्यटन स्थलों तक ही सीमित नहीं रखना है।
बल्कि इन्हें गांवों तक ले जाएं तथा स्वस्थ जीवन शैली को अपनाते हुए सांस्कृतिक संरक्षण में सहभागी बनें। उन्होंने ऊँटनी के दूध के औषधीय गुणधर्मों की उपयोगिता को विस्तारपूर्वक समझाया तथा कहा कि केन्द्र के अधिदेशों में इको-टूरिज्म सम्मिलित है,
इस दृष्टि से हमारा प्रयास रहता है कि उष्ट्र प्रजाति एवं ऊँट पालकों के कल्याण हेतु सकारात्मक दिशा में काम करते हुए उन्हें अधिकाधिक लाभ पहुंचा सके ताकि यह व्यवसाय नए आयामों में मुखरित हो सके।
इस अवसर पर श्रीमती शैलजा कथूरिया, पर्यटन सलाहकार, पर्यटन मंत्रालय, नई दिल्ली ने भी उष्ट्र प्रजाति एवं पर्यटन विकास से जुड़े कई मुद्दों को सदन के समक्ष रखा। केन्द्र के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. आर.के.सावल एवं डॉ. जितेन्द्र सोलंकी, युवा उद्यमी ने उष्ट्र इको-टूरिज्म से जुड़े नए आयाम, वस्तु स्थिति, चुनौतियां एवं समाधान आदि संबंधित अपने-2 प्रस्तुतीकरण दिए।
इस बैठक में प्रगतिशील ऊँट पालक श्री जगमाल सिंह राईका, श्री मोतीलाल कुमावत एवं श्री जोराराम ने ऊँट पालकों से जुड़े विभिन्न मुद्दों व चुनौतियों यथा- चरागाह की कमी, ओरण क्षेत्रों की वस्तुस्थिति का उल्लेख किया एवं अपने सुझाव भी दिए। परिचर्चा के समन्वयक डॉ. सुमन्त व्यास, प्रधान वैज्ञानिक ने परिचर्चा के उद्देश्य एवं महत्व पर प्रकाश डालते हुए सभी के प्रति धन्यवाद




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