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जगन्नाथपुरी (उड़ीसा) में देवीदत्त दूदवाला धर्मशाला में आयोजित श्री भक्तमाल कथा में चतुर्थ दिन कथा व्यास प.पू. महन्त श्री भरत शरण जी महाराज, वृन्दावन के श्रीमुख से प्रवचन के कुछ विशेष अंश : जगन्नाथपुरी उड़ीसा।

   जगन्नाथपुरी (उड़ीसा) ।(तोलाराम मारू ) । प.पू. महन्त श्री भरत शरण जी महाराज ने आज चतुर्थ दिन की भक्तमाल कथा में गोस्वामी तुलसीदासजी के चरित्र पर शानदार चित्रण प्रस्तुत किया और बताया कि भक्तमाल कथा के प्रथम श्रोता भगवान श्रीजगन्नाथजी है। जब कोई भक्तमाल कथा सुनता है तो कमजोर और दु:खी आदमी के मन में भी जोश व ऊर्जा का संचार होता है। भक्तमाल कथा श्रीरामचरितमानस के समकक्ष है।
महाराजश्री ने बताया कि रामचरितमानस ने यह स्पष्ट किया कि शिव और राम में कोई भेद नहींं है और भक्तमाल ने भगवान के भक्तों को एक मंच पर किया। रामचरितमानस में श्रीराम ने यह स्पष्ट कहा कि शिव द्रोही मम दास कहावा सो नर मोहि सपनेहु नहि पावा।अत: राम, कृष्ण, जगन्नाथ, शिव किसी नाम को जिसकी जो इच्छा हो, उसी को भजें। ये सभी एक है।
लोग धर्म शास्त्र पढ़ते तो हैं पर उनको हृदय में धारण नहीं करते। इसीलिए उनके हृदय से अंधकार दूर नहीं होता। उन्होंनें श्रद्धालु भक्तों को सलाह देते हुए कहा कि राम नाम की बहुत महिमा है। वे अब भी यह संकल्प करलें कि अब तक जो समय नष्ट कर दिया, अब नहीं करेंगें, भगवान की सेवा में समय लगावे।महाराजश्री ने बताया कि संसार में कोई हमारा कल्याण कर सकता है तो केवल भगवान ही कर सकते हैं। भगवान हर जगह खुद आपकी मदद करने नहीं आते और वे अपने संतों और भक्तों को अपना प्रतिनिधि बना कर आपकी सहायता के लिए भेज देते हैं। गोस्वामीजी भगवान के प्रतिनिधि है।
उन्होंनें गोस्वामीजी के काशी प्रवास की घटनाओं और उनके चरित्र पर जानकारियां दी और काशी का महत्व बताया और कहा कि काशी में शरीर छोड़ने पर भगवान शंकर उसके पास आकर कान में राम मंत्र कि दीक्षा देते हैं, जिससे उसका मोक्ष हो जाता है।महाराजश्री ने कहा कि जो भगवान की सेवा करे, संतों की सेवा करे और भगवान के भक्तों की सेवा करे वे सब भगवान के भक्त है। कण कण में भगवान बसते हैं। अत: किसी साधु संत या भगवान का अपमान कभी मत करना। पता नहींं कब कौन किस किस रूप में हों।आज राजस्थान में गाय माता लम्पी रोग से ग्रस्त है और हजारों की संख्या में गायें मृत्यु की शिकार हो गई है। अत: आज कथा के दौरान गुरूदेव के आदेश से गाय माता को रोग मुक्त करने और उसके प्राण बचाने के लिए भगवान श्री जगन्नाथजी से प्रार्थंना की गई। इस अवसर पर श्री आनन्दजी मन्त्री ने मधुर आवाज में गीत प्रस्तुत किया । 
तर्ज- भला किसी का कर ना सको तो बुरा किसी का मत करना। सौ तीरथ का पुण्य मिलेगा मिलेगा हर दुःख से आराम,
गौ माता की सेवा करले समज ले होंगे चारो धाम,जिसने गौ की सेवा कर्ली वो जीवन तो निहाल,गौ पालन से ही कन्हियाँ कहलाये।गौ माता की सेवा करले समज ले होंगे चारो धाम। 

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