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लुप्त होते परंपरागत खेल खारड़ा धर्म चन्द सारस्वत संस्थान खारड़ा ।

सिटी एक्सप्रेस न्यूज।खारड़ा। आधुनिक खेलों की चकाचौंध के आगे परम्परागत ग्रामीण खेल तेजी के साथ लुप्त होते जा रहे हैं। क्रिकेट, बैडमिंटन जैसे खेल तेजी से लोकप्रिय होते जा रहे हैं। इनमें भी क्रिकेट का बुखार तो छोटे मोटे गांवों तक में फैल गया है। 
खेल विभाग की उपेक्षा एवं उदासीनता के कारण परम्परागत खेलों में बच्चों की रुचि समाप्त होती जा रही है। 
स्कूलों में भी इन खेलों को कोई महत्व नहीं दिया जा रहा है। खारड़ा युवा विकास संस्था के अध्यक्ष दामोदर सारस्वत निवासी कहते हैं कि पहले शाम होते ही गांवों में खेल का जो शमां बंधता उससे बुजुर्गो का मन भी उमंगित हो पड़ता था। कबड्डी का एक दाव खेलने को उनका बूढ़ा मन भी जवान हो उठता था। कभी शाम होते ही ग्रामों में कबड्डी-कबड्डी आदि जोश और उत्साह से भरी आवाजें कभी कभार ही सुनाई पड़ती थी।
 बिना किसी प्रकार के खर्च वाले इस खेल में प्रतिभागियों को अपनी शक्ति व शौर्य के साथ शारीरिक व मानसिक कुर्ती का प्रदर्शन करना पड़ता है। ग्रामीणों का यह प्रमुख खेल उनकी दिनचर्या से धीरे धीरे बाहर हो गया है।
खारड़ा गांव के ही बुजुर्ग रामनारायण सारस्वत ,बजरंगलाल सारस्वत ने बताया की होली का त्योहार ऐसे समय पर आता है की हर कोई खेती बाड़ी के काम से फ्री होकर फाल्गुन के महीने में चंग बजाते थे और ग्रामीण खेल बड़ी ही चाव और भाईचारे के साथ खेलते थे।
उनका कहना था की जब हम और हमारे साथी बाहर कमाने प्रदेश जाते थे तो फाल्गुन के महीने में अपने गांव जरूर आते थे ।ग्रामों में खेले जाने वाले खेल कबड्डी , गुल्ली डंडा, चोर-सिपाही, लुका छिपी, ऊंची कूद, लंबी कूद, रस्सी- कूद, बांस-कूद, रस्साकसी, कुश्ती, खो-खो, जलेबी दौड़, कुर्सी-दौड़, लगंड़ी दौड़, पीलियो भाटो,हड़बली, कां कूट, आदि न जाने कितने खेल प्रचलित ये बिना व्यय वाले इन सर्व शुलभ खेलों में जितना शारीरिक व मानसिक विकास होता था उतना आज के बेहद खर्चीले खेलों से शायद ही हो पाता हो। आधुनिक की चकाचौंध और टेलीविजन के व्यापक, प्रचार प्रसार से बच्चों के पसंदीदा खेल चोर-सिपाही, लुका छिपी, ऊंचा नीचा, खो-खो आदि भी सिमटते जा रहे हैं। बच्चे अब खेलों की अपेक्षा टीवी देखना अब ज्यादा पसंद करने लगे हैं। खिलाड़ियों का चारित्रिक, मानसिक एवं शारीरिक विकास करने वाले अन्य ग्रामीण खेल दौड़, कुश्ती , तैराकी, रस्सा खींच, ऊंची कूद, बांस कूद, निशानेबाजी, रस्सी कूद, अटाई डंडा आदि न जाने खेल समय के साथ सिमटते जा रहे हैं। पारंपरिक खेलों में गिरावट आदि के अनेक कारण हैं। जिनमें आज की भौतिकवादी गतिशील जिंदगी में समय की कमी, क्रिकेट, हाकी, बैडमिंटन आदि आधुनिक खेलों की तेजी के साथ बढ़ती लोकप्रियता, इंडोर, वीडियों गेम और सबसे मुख्य मोबाइल में बढ़ती अभिरुचि, का व्यापक प्रभाव आदि कारण है।

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