सामाजिक सेवाभाव की राजनीति ही जननेताओं का अंतिम सर्वोपरि लक्ष्य होना चाहिए।
बीकानेर।धरातल पर बदलाव लाने के लिए राजनीति सबसे सशक्त माध्यम है, राजनीति के द्वारा हम समाज के दबे-कुचले लोगों और उपेक्षित समुदायों को ऊपर उठाते हुए सामाजिक-आर्थिक विषमताओं को दूर करने का भरसक प्रयास कर सकते है,एक व्यापक बदलाव लाने का जो कार्य, बड़े से बड़े वेतन वाली प्रतिष्ठित नौकरी करके भी नहीं किया जा सकता है, उसे राजनीति के माध्यम से आसानी से किया जा सकता है, राजनीति हमें सामाजिक न्याय के ऐसे बदलाव का सजग प्रहरी बना सकती है जो समस्त मानव जाति के कल्याण के लिए अत्यन्त आवश्यक है।
यदि हम अपने राजनैतिक इतिहास में जाकर देखें तो पता चलता है कि अनेक विद्वानों ने देश एवं समाज के कल्याण के लिए, अपना सम्पूर्ण जीवन, राजनीति को समर्पित कर दिया,महात्मा गांधी ,सरदार वल्लभभाई पटेल से लेकर पण्डित नेहरू ,अटल बिहारी वाजपेयी तक अनेक प्रकाण्ड विद्वानों ने उच्चशिक्षा ग्रहण करने के बाद भी राजनीति को ही अपना कर्मक्षेत्र बनाया,एक युगद्रष्टा एवं क्रांतिकारी समाज सुधारक के रूप में बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर जैसे उच्चकोटि के विद्वानों, महापुरुषों एवं नीति-निर्माताओं ने जिन संकल्पों के साथ हमें हमारा संविधान दिया, उसमें समस्त राजनीति ने एक संरक्षक की भांति अपनी भूमिका निभाई, लेकिन कालांतर में राजनीति पर गलत दृष्टि डालने वालों ने जनप्रतिनिधि का मुखौटा लगाकर राजनीति में जनता को महत्व न मिलकर,जनता की उपेक्षा करके राजनेता नायक बनकर उभर रहे है और इसी कारण राजनीति में अनेक प्रकार की विसंगतिया पैदा होने लगीं,अब सामाजिक राजनीति का समय आ गया है। देश को जातपात भेदभाव से ऊपर उठाने की जरूरत है ,सभी धर्म पन्थ समुदाय मिलजुलकर देश को गौरवान्वित करने की आवश्यकता है देश में आए भूकंप सुनामी बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा में युवाओ द्वारा किए गए कार्यों की सराहना की जरूरत है,सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा जरूरतमंद बच्चों, वंचितों शोषित ,गरीबो,पिछड़ों के लिए किए गए कार्यों की बार-बार प्रशंसा की आवश्यकता है अतःसामाजिक कार्यकर्ताओ से सीख की आवश्यकता है ,सांसदों व विधायकों को समाज के साथ संवाद में सामाजिक कार्यों से जुड़ने की जरूरत है। अब नेताओं को समाज सेवा से जुड़ना चाहिए, क्योंकि जनता विशुद्ध राजनीति की जगह सामाजिक कार्यों से ज्यादा प्रभावित होती है।इसमें कोई दो राय नहीं कि मात्र सत्ता की राजनीति हमें सीमित एवं स्वार्थी बनाती है। इसके साथ समाज का जुड़ाव, सामाजिक मुद्दों का जुड़ाव हमें विकसित एवं विस्तारित करता है। यह हमें सत्ता की राजनीति के अंधे गलियारे से निकालकर एक ताजी हवा देता है।आज देश मे इन्हीं अपीलों एवं सुझावों में राजनीति की सामाजिक संवेदना की बात की जरूरत है। नीरस, निष्ठुर एवं लोलुप किस्म की राजनीति का अर्थविस्तार इसी सामाजिक संवेदना के होने से ही संभव है। अच्छा होता कि अन्य राजनीतिक दलों का नेतृत्व पक्ष भी अपने राजनीतिक नेतृत्व को एक प्रकार की सामाजिक राजनीति विकसित करने का सुझाव देता,
संभव है कि सामाजिक जुड़ाव की सोच भविष्य में और प्रभावी होकर उभरे, यह भी हो सकता है कि यह सोच मात्र खबर में तब्दील होकर रह जाए, किंतु भारतीय जनतंत्र एवं राजसत्ता की राजनीति को कहीं न कहीं सामाजिक सेवाभाव से जुड़ना ही होगा। यही सेवाभाव लोगों में राजनीति के प्रति हो रहे मोहभंग को खत्म कर एक नया विश्वास जगा पाएगा। राजनेता द्वारा अपनी विविध नीतियों से जनता में अपने एवं अपनी राजनीति के लिए विश्वास भाव निर्मित करने की भावना रहे , यहीं राजनेताओं के लिए लोगो के दिल में बड़ी सफलता दिलाएगा। जनता की सेवा ही जननेताओं का अंतिम सर्वोपरि लक्ष्य होना चाहिए
सभी दलों को भी नकारात्मक कार्य नीतियों एवं रणनीतियों की काट तलाशनी होगी। सामाजिक सेवाभाव का राजनीति से जुड़ाव निर्मित करने का मिशन ही भारतीय जनतंत्र की राजनीति को और ज्यादा गहरा, प्रभावी एवं सार्थक बना पाएगा। समाज को अलग अलग आइनों से देखने की दृष्टि में सभी राजनीतिक दलों में है, अब समाज को एक आईने से देखने की आवश्यकता है साथ ही विकसित एवं शांतिपूर्ण समाज रचने की जिम्मेदारी सबकी है।
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