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संपादक की कलम:- सौरभ सैनी, हट गई आंखों पर जमी विज्ञापनों की धूल

 

आ गए दसवीं बोर्ड परीक्षा परिणाम सीबीएसई में फिर बेटियों ने मारी बाजी खबर बड़ी थी पहले पृष्ठ पर होनी चाहिए थी परंतु विज्ञापनों ने इसे तीसरे पृष्ठ पर पहुंचा दिया था गलती अखबार की एजेंसी की भी नहीं थी बाजार का मोह जाल ऐसा ही है आखिर काम तो डिमांड और सप्लाई का ही होता है भरे भरे विज्ञापनों के पृष्ठ मोटी कमाई जो देते हैं प्रकाश को को।

ऐसा ही एक विज्ञापन पृष्ठ लिए पड़ोस के योगी भैया बेटी समीक्षा के साथ आ पहुंचे थे सुबह सुबह और स्वभाव अनुसार हर बढ़ाते हुए बोले लेखक बाबू कहां हो यह आवाज सुन भतीजा लक्ष्य इशारों में बोला शांत हो जाओ मैं बुला कर लाता हूं क्योंकि पिताजी उस समय सुबह की पूजा कर रहे थे और उन्हें पूजा में कोई दखल पसंद नहीं है ।

मैं चाय के साथ अखबार की सुर्खियों में मशगूल था इतने में ही कमरे में आ पहुंचे और बोले लेखक बाबू समीक्षा को तो आप जानते ही हैं कि यह कितनी होनहार है। मैं इन विज्ञापनों को देख बड़ी दुविधा में फंस गया हूं कि इसे दसवीं जमात में कौन से school में भर्ती करवाऊं।

इनकी यह दुविधा पूर्ण परिस्थिति हर वह पाठक समझ सकता है जिसके बच्चे इस साल दसवीं कक्षा बारहवीं बोर्ड परीक्षा में बैठ रहा हूं समीक्षा का स्वभाव किंचित पिता के स्वभाव से विपरीत था वह शांत चित्त दिख रही थी मानो उसके दिमाग में इस सब कुछ शीशे की तरह साफ हो।

क्योंकि इसके पहले वाले स्कूल में दसवीं जमात के परिणाम उतने  नहीं आते थे जितने की उनको उम्मीद है। ऐसा योगी भाई को लगता था इसलिए उन्होंने ठान ही रखी थी कि मैं स्कूल बदलूंगा।जब उन्होंने यह बात मुझे बताई तो मैंने कहा कि मैं पहले समीक्षा से बात करूंगा उसके बाद हम किसी विद्यालय के निर्णय की ओर आगे बढ़ेंगे।

मैं समीक्षा की ओर मुखातिब हुआ और उससे पूछा बेटा तेरी क्या इच्छा है तू क्या करना चाहती है तो उसने कहा कि चाचा मैं पढ़ाई के साथ साथ शतरंज खेलना भी पसंद करती हूं और मैं ऐसे विद्यालय में जाना चाहती हूं जो मुझे शतरंज के क्षेत्र में आगे बढ़ाएं और यह विद्यालय मुझे शतरंज में जिला स्तरीय प्रतिनिधित्व का अवसर दे चुका है अब मैं इसी विद्यालय में रहकर पढ़ना चाहती हूं पर पापा को तो 95% लिवाने की धुन सवार है। इतने में योगी भाई तमतमाते हुए बोलने की कोशिश करने लगे तो मैंने उन्हें इशारे से चुप कर दिया।

कॉलेज के दिनों में मैं भी शतरंज का शौकीन रह चुका था तो मैंने बिसात बिछा ली और कमरा खेल के मैदान में तब्दील हो गया था और दर्शक के रूप में लक्ष्य और पिताजी मां के साथ मौजूद थे। योगी भाई तो थे ही एक के बाद एक समीक्षा ने मुझे 4 खेलों में मात दी ।इतनी छोटी उम्र में ऐसे हुनर को देख कर मुझे ईर्ष्या तो हुई पर कहीं ना कहीं मुझे उसके खेल ने प्रभावित तो किया था।
लगभग ऐसा ही प्रभाव योगी भाई पर भी पड़ा। देख लिया बेटी का हुनर मैं योगी भाई की तरफ मुड़ते हुए बोला तो उन्होंने कहा कि मेरी आंखों पर विज्ञापनों की धूल जमी थी लेखक बाबू आपने वह हटा दी अब तो मैं इसे दूसरी विश्वनाथन आनंद बनाऊंगा स्वभाव के प्रति विरोधाभास दिखाते हुए तपाक से
समीक्षा बोली नहीं पापा पहली समीक्षा बनूंगी उसका आत्मविश्वास देख मेरी आंखों में चमक आ गई थी और मैं गदगद था परंतु कहीं ना कहीं एक कोने में चिंता भी खाए जा रही थी कि ऐसे योगी भाई तू हर जगह हर मोहल्ले में होंगे , हर बेटी के सपने कैसे पूरे हो। अंत में  मैं पाठक वर्ग से निवेदन करता हूं की हर मोहल्ले के योगी भाई को आप लेखक बाबू बनकर बेटियों के सपने पूरे करें जय जय

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