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मथुरा की रिपोर्ट, श्रीकृष्ण की लीला और दुर्वासा ऋषि की कथा गौ पुत्र धर्म दास महाराज ने बताई l

मथुरा।(वनवास काल की अद्भुत घटना)महाभारत काल की यह कथा उस समय की है, जब पांडव अपना वनवास काल काट रहे थे। वन में उनका जीवन अत्यंत सादा था, पर धर्म, सेवा और अतिथि-सत्कार उनका मूल स्वभाव था।उसी समय हस्तिनापुर में दुर्योधन के मन में पांडवों के प्रति ईर्ष्या और द्वेष की ज्वाला धधक रही थी। वह किसी भी प्रकार से पांडवों को अपमानित और नष्ट करना चाहता था।
दुर्योधन की चाल दुर्योधन ने एक दिन क्रोधी स्वभाव के लिए प्रसिद्ध महर्षि दुर्वासा और उनके दस हज़ार शिष्यों की भव्य सेवा की। सेवा से प्रसन्न होकर दुर्वासा ऋषि ने वरदान माँगने को कहा।दुर्योधन ने चालाकी से कहा—“हे मुनिवर! आप अपने शिष्यों सहित वन में पांडवों के आश्रम जाएँ, किंतु भोजन के बाद जाएँ।”
उसके मन में यह कुटिल योजना थी कि उस समय पांडवों के पास भोजन नहीं बचेगा और क्रोधित होकर दुर्वासा ऋषि उन्हें भयानक श्राप दे देंगे।पांडवों पर संकट उधर वन में पांडवों के पास सूर्यदेव का दिया हुआ अक्षयपात्र था।उस पात्र से प्रतिदिन तब तक भोजन निकलता था, जब तक द्रौपदी स्वयं भोजन न कर लें। उस दिन सभी भोजन कर चुके थे।तभी दुर्वासा ऋषि अपने शिष्यों सहित आश्रम पहुँचे और बोले
“हम स्नान करके आते हैं, तब तक हमारे लिए भोजन की व्यवस्था रखो।
पांडवों के चेहरे उतर गए।युधिष्ठिर चिंतित हो उठे, भीम व्याकुल हो गए, और द्रौपदी का हृदय काँप उठा। ऋषि दुर्वासा का क्रोध सर्वविदित था।द्रौपदी की पुकार
द्रौपदी ने किसी से कुछ न कहा।उन्होंने केवल श्रीकृष्ण का स्मरण किया“हे द्वारिकाधीश!हे सखा!आज हमारी लाज आपके ही हाथ में है।”श्रीकृष्ण का प्रकट होना
क्षण भर में श्रीकृष्ण प्रकट हुए और मुस्कराकर बोले“सखि द्रौपदी! मुझे बहुत भूख लगी है, कुछ खाने को दो।”
द्रौपदी लज्जित स्वर में बोली“प्रभो! आज अक्षयपात्र खाली हो चुका है फिर भी उन्होंने पात्र श्रीकृष्ण के सामने रख दिया।
 एक दाने का चमत्कार श्रीकृष्ण ने पात्र में देखा नीचे एक चावल का दाना और थोड़ा सा जल शेष था।उन्होंने प्रेमपूर्वक वह दाना खाया और बोले“अब मैं पूर्ण तृप्त हूँ। ऋषियों की तृप्ति उसी क्षण नदी में स्नान कर रहे दुर्वासा ऋषि और उनके दस हज़ार शिष्यों को ऐसा अनुभव हुआ मानो उन्होंने भरपेट भोजन कर लिया हो।उनका पेट भर गया, अन्न का एक कण भी खाने की इच्छा शेष न रही।
ऋषि समझ गए—“यह तो श्रीकृष्ण की महालीला है!”
लज्जित होकर वे बिना भोजन किए ही वहाँ से चले गए।
 संकट का अंत पांडवों का महान संकट टल गया।
द्रौपदी की लाज बच गई।और संसार ने जान लिया जहाँ सच्ची भक्ति होती है,वहाँ ईश्वर स्वयं संकट हरने आते हैं।
 कथा की सीख भगवान को पुकारने के लिए साधन नहीं, श्रद्धा चाहिए l
 एक दाना भी यदि प्रभु को अर्पित हो जाए, तो वह संसार को तृप्त कर सकता है ईर्ष्या और कपट अंततः स्वयं को ही लज्जित करते हैं l कृष्णा तथा ब्रजवासी गौ रक्षक सेना भारत संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष व श्री राधे ब्रजवासी गौशाला ट्रस्ट के संस्थापक स्वामी गौ पुत्र धर्म दास महाराज ने पूरी कथा कही l

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